परछाई...
- Mukul Bharadwaj

- Jul 28
- 2 min read

मेरे पति की परछाई कभी-कभी उनसे अलग चलती थी।
पहले मुझे लगा मेरा वहम है।
एक दिन मैंने वीडियो बना लिया। वीडियो में साफ़ दिख रहा था...
मेरे पति खड़े थे,
लेकिन उनकी परछाई हाथ हिला रही थी।
मैंने वो वीडियो उन्हें दिखाया तो उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
उन्होंने कहा,
"तुमने ये किसी और को तो नहीं दिखाया?"
और फिर वो अचानक घर से बाहर भाग गए।
लेकिन उसी वक्त दरवाज़े पर दस्तक हुई।
मैंने काँपते हाथों से दरवाज़ा खोला।
सामने... मेरे पति खड़े थे।
वही कपड़े... वही चेहरे की थकान... वही आँखें...
उन्होंने घबराकर पूछा, "क्या हुआ? तुम इतनी डरी हुई क्यों हो?"
मेरे हाथ से मोबाइल गिर गया।
"लेकिन... तुम तो अभी भागकर गए थे..."
वो कुछ पल मुझे देखते रहे।
फिर धीरे से बोले, "मैं तो अभी ऑफिस से आया हूँ।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
मैंने तुरंत मोबाइल उठाया और वीडियो चलाया।
वीडियो में वही दृश्य था...
एक आदमी बिल्कुल मेरे पति जैसा खड़ा था।
लेकिन...
उसकी परछाई उससे अलग होकर अपने हाथ हिला रही थी।
मेरे पति ने वीडियो देखा।
इस बार उनका चेहरा डर से नहीं... बल्कि गहरे दुःख से भर गया।
उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
"आख़िर... तुमने उसे देख ही लिया..."
मैंने काँपती आवाज़ में पूछा,
"किसे?"
उन्होंने शीशे की तरफ़ इशारा किया।
"मेरी परछाई को नहीं... मेरे उस हिस्से को... जिसे मैं वर्षों पहले पीछे छोड़ आया था।"
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उन्होंने पहली बार अपने बचपन की बातें बताईं।
वो चित्रकार बनना चाहते थे।
गिटार बजाना चाहते थे।
दुनिया घूमना चाहते थे।
लेकिन घर की गरीबी...
बीमार पिता...
छोटी बहन की पढ़ाई...
माँ की दवाइयाँ...
फिर नौकरी...
शादी...
बच्चे...
कर्ज़...
हर ज़िम्मेदारी पूरी करते-करते उन्होंने एक-एक करके अपने सारे सपनों को ख़ामोशी से दफ़ना दिया।
हर बार जब उन्होंने अपनी किसी इच्छा को मारा...
उनका एक हिस्सा उनसे अलग होता गया।
वो हिस्सा कभी पूरी तरह मर नहीं पाया।
वह उनकी 'परछाई' बन गया।
दुनिया को वह दिखाई नहीं देता था...
लेकिन कैमरा...
सच और झूठ के बीच छिपी दरारों को पकड़ लेता है।
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उन्होंने कहा,
"दिन में मैं जीता हूँ... रात में वो।"
"मैं बच्चों की फीस भरता हूँ... वो कैनवास पर अधूरी पेंटिंग बनाता है।"
"मैं प्रमोशन के लिए मुस्कुराता हूँ... वो पहाड़ों में घूमता है।"
"मैं सबकी उम्मीदें पूरी करता हूँ... वो मेरी अधूरी ज़िंदगी जीता है।"
"हम दोनों एक ही शरीर में नहीं रह सकते थे...
इसलिए मेरा मन हमें दो हिस्सों में बाँट बैठा।"
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मैंने पूछा,
"तो क्या तुम बीमार हो?"
वो मुस्कुराए।
"नहीं...
बस इंसान हूँ।"
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उस रात मैंने पहली बार गौर किया...
हम सबकी परछाइयाँ हमारे साथ नहीं चल रही थीं।
किसी की परछाई फ़ोन पर झुकी हुई थी।
किसी की ऑफिस की फ़ाइलों में दबी थी।
किसी की अस्पताल के बाहर बैठी थी।
किसी की मंच पर गा रही थी...
जबकि असली इंसान कहीं और अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभा रहा था।
शायद हम सब...
धीरे-धीरे...
अपनी परछाइयों से अलग होते जा रहे हैं।
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अगली सुबह मेरे पति ने वर्षों बाद अपनी पुरानी स्केचबुक निकाली।
सिर्फ़ दस मिनट चित्र बनाया।
उस रात...
पहली बार...
वीडियो में उनकी परछाई बिल्कुल उनके साथ चल रही थी।



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