नौकरी..
- Mukul Bharadwaj

- Dec 5, 2024
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सर्दियों की सुबह थी। हल्की कोहरे के बीच ट्रेन की सीटी बजी और रोहन अपनी सीट पर जाकर बैठ गया। यह उसकी पहली नौकरी के लिए एक नई शुरुआत थी। थोड़ी ही देर में,एक बुजुर्ग व्यक्ति आकर उसके सामने वाली सीट पर बैठ गए। उम्र के निशान उनके झुर्रियों में साफ झलक रहे थे। ट्रेन के चलने के साथ, उन्होंने रोहन से पूछा, "कहां जा रहे हो, बेटा?" रोहन मुस्कुराकर बोला, "नई नौकरी के लिए, सर।" बुजुर्ग व्यक्ति ने सिर हिलाया और खिड़की के बाहर देखने लगे। कुछ देर बाद, उन्होंने धीमे स्वर में कहा, "क्या तुम एक कहानी सुनना चाहोगे?"
रोहन को सफर काटने का यह विचार अच्छा लगा। उसने उत्सुकता से हामी भर दी। "बहुत समय पहले की बात है। एक गांव में नीरज नाम का आदमी रहता था। वह साधारण था, लेकिन उसकी जिंदगी का मकसद बड़ा था – अपने बेटे को ऐसा भविष्य देना, जो वह खुद कभी नहीं जी पाया।" "नीरज दिन-रात मेहनत करता था। खेत में, बाजार में, और यहां तक कि दूसरों के घरों में। उसका एक ही सपना था – अपने बेटे को पढ़ाई के लिए शहर भेजना।" "लेकिन यह आसान नहीं था। गांव में बाढ़ आई और नीरज ने अपनी जमीन खो दी तब भी उसने हार नहीं मानी। वह शहर जाकर मजदूरी करने लगा उसने अपने बेटे को बड़े स्कूल में दाखिला दिलाया। धीरे-धीरे, बेटे ने पढ़ाई पूरी की, एक बड़ी नौकरी पाई, और शहर में बस गया।"
रोहन ने उत्सुकता से पूछा, "फिर क्या हुआ?" बुजुर्ग आदमी ने एक हल्की मुस्कान के साथ कहा, "फिर? बेटा इतना व्यस्त हो गया कि उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।" "नीरज बूढ़ा हो गया। वह हर त्यौहार पर बेटे के आने का इंतजार करता, लेकिन उसका बेटा कभी नहीं आया नीरज ने खुद को समझा लिया कि शायद वह अपने बेटे की खुशी के लिए एक अधूरी कहानी बनकर रह जाएगा।"
रोहन की आवाज भर्रा गई। उसने पूछा, "वो बेटा कभी वापस आया?"
बुजुर्ग आदमी ने धीरे से कहा, "नहीं।"
ट्रेन अचानक धीमी होने लगी। स्टेशन करीब आ गया था।
बुजुर्ग व्यक्ति ने अपनी छड़ी उठाई और उठते हुए कहा, "तुम्हारी पहली नौकरी है, न?सुनो बेटा, ज़िंदगी में ऊंचा उड़ो, लेकिन कभी इतना मत बढ़ जाना कि उन जड़ों को भूल जाओ, जिन्होंने तुम्हें उठने का साहस दिया।"*
ट्रेन रुक गई। बुजुर्ग व्यक्ति स्टेशन पर उतर गए। रोहन खिड़की से उन्हें जाते देखता रहा।
उस रात, उसने अपनी मां को फोन किया। कॉल उठते ही उसने पहली बार कहा, "माँ, मैं आपसे बहुत प्यार करता हूं।"
***
ट्रेन की धीमी रफ्तार के साथ, राघव खिड़की से बाहर देख रहा था। खेत, गांव, और लोग पीछे छूटते जा रहे थे, जैसे उसकी अपनी जिंदगी में छूट गए रिश्ते। उसके हाथ में एक पुराना, फटा हुआ पर्स था, जिसमें बस एक तस्वीर थी – उसके पिता, नीरज की। राघव ने याद किया, कैसे उसका बचपन पिता के संघर्षों और त्याग के साए में बीता गांव के छोटे से घर में पिता की मेहनत से हर दीवार में उनकी खामोश दुआएं गूंजती थीं वह हर सुबह खेतों में जाते और रात तक मजदूरी करते। "पढ़ाई कर लो, बेटा," पिता हमेशा कहते।"तुम्हें इस गरीबी से आजाद करना है।" राघव ने पढ़ाई में दिल लगाया उसकी मेहनत रंग लाई। उसने एक बड़े कॉलेज में दाखिला पाया, फिर एक बड़ी नौकरी। हर सफल कदम उसे पिता के सपनों के करीब लग रहा था। लेकिन, जिंदगी उतनी आसान नहीं थी।
शहर में नौकरी करने के साथ ही जिम्मेदारियां भी बढ़ीं। वह हर महीने पैसे भेजता, लेकिन कॉल करने या घर जाने का वक्त नहीं निकाल पाता। हर बार फोन पर, पिता की वही आवाज सुनाई देती:"तू बस खुश रहना, बेटा।"
पिता की यह बात उसके दिल को सुकून तो देती थी, लेकिन अंदर ही अंदर अपराधबोध भी भर देती थी। उसने कई बार सोचा, "अगली छुट्टी पर जरूर जाऊंगा," लेकिन काम और समय के दबाव ने उसे रोक लिया।
एक दिन, ऑफिस में एक अनजान नंबर से फोन आया। दूसरी तरफ गांव के किसी शख्स की टूटी-फूटी आवाज थी।"राघव बेटा, नीरज चाचा नहीं रहे।"
वह कुछ पल के लिए सुन्न हो गया। उसकी दुनिया जैसे थम गई। उस समय उसे एहसास हुआ कि वह पिता को आखिरी बार देख भी नहीं सका।
***
पिता की मौत के बाद, राघव उनके कमरे को साफ कर रहा था। वहां एक पुराना संदूक मिला। उसमें उनकी कुछ चीजें थीं – पुराने कपड़े, एक टूटी हुई घड़ी, और एक नोटबुक।
नोटबुक के पहले पन्ने पर लिखा था:"बेटा राघव, जब भी यह पढ़े, तो जान लेना कि मैंने तुझसे कभी कोई शिकायत नहीं की। तेरी हर खुशी मेरे लिए सबसे बड़ी थी। अगर तू कभी नहीं आ सका, तो मैं समझता हूं कि तूने ऐसा क्यों किया। तेरा सपना ही तो मेरा सपना था।"
राघव ने वह नोटबुक अपने सीने से लगा ली। उस पल वह फूट-फूट कर रोया।
गांव में लोग कहते थे, "राघव ने कभी अपने पिता की परवाह नहीं की।"लेकिन कोई नहीं जानता था कि राघव अपने पिता के लिए कितना जीता था। उसकी हर उपलब्धि, हर संघर्ष सिर्फ उनके सपनों को साकार करने के लिए था।
राघव अक्सर सोचता, "क्या मैंने गलत किया? क्या पिता को छोड़कर अपने सपनों का पीछा करना सही था?"फिर उसे अपने पिता की बातें याद आतीं।
"हर माता-पिता का सपना होता है कि उनके बच्चे उनसे आगे बढ़ें।"
पिता ने उसे दोषमुक्त कर दिया था। लेकिन राघव का दिल आज भी उस अधूरे अलविदा की टीस में बंधा हुआ था।




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