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मैं न कहती थी...

“मैं न कहती थी इसके लक्षण ठीक नहीं हैं”, रूचि ने अपने पति को कोहनी मारते हुए धीरे से कहा। रोज़ ही की तरह रमन आज फिर लड़खड़ाता हुआ सा घर में दाखिल हुआ। फिर बिना किसी से कुछ कहे सुने चुपचाप अपने कमरे की ओर हो लिया । “हो सकता है थका हुआ हो”, मुकेश ने छोटे भाई का बचाव करने के लहजे में कहा। “घंटे का थका हुआ ह। काम ही क्या है इसके पास। सारा दिन तो उस दो कौड़ी की दुकान में कुर्सी तोड़ता है और रात में घर आकर मुफ्त की रोटी। मैं फिर कह रही हूँ इसके लक्षण ठीक नहीं हैं ”, रूचि ने सख्ती से दोहराया। मुकेश जानता था पर कभी कुछ कहने की हिम्मत सी न हुई। सो चुपचाप ज़मीन ताकता रहा। “छुटकी बहुत खेलने लगी है इसके साथ। छोटी बच्ची है सो कुछ जानती बूझती नहीं । हमें ही दूर रखना पड़ेगा”, रूचि ने दांत पीसते हुए कहा। भला एक चाचा को उसकी भतीजी से दूर क्यों रखना । मुकेश ने फिर सोचा पर हमेशा की तरह चुप ही रहा। सोचा गुस्से में कुछ भी बकती है । क्यों सिर मारना । थोड़ी देर में चुप हो जाएगी। “तुम कुछ बोलते क्यों नहीं हो? भाई होगा तुम्हारा अपने लिए । मेरी बच्ची से प्यारा नहीं है मुझे”, कहकर रूचि रसोईघर की ओर बढ़ी। मुकेश ने चुप रहना ही बेहतर समझा । फिर पत्नी को आँखों से ओझल होते देख धीरे से रमन के कमरे के बहार जाकर आवाज़ लगाई- “रमन, तुमने खाना खाया?” । “जी भैया, मैं बाहर से खा कर आया हूँ”, रमन की आवाज़ में वो शराब की लड़खड़ाहटतो नहीं थी। और थोड़ी बहुत पी भी ली तो क्या फरक पड़ता है । सोचकर मुकेश वापस हो लिया।


सवेरे सवेरे हमेशा की तरह छुटकी अपने चाचा के कमरे की तरफ दौड़ पड़ी । न जाने क्या लगाव था जो अपनी माँ के लाख समझाने डांटने पर भी वो एक न सुनती थी। रमन चाचा कहना तो उसके मुँह से और भी प्यारा लगता । और रमन भी उसे बेइंतहा प्यार करता । छुटकी का असली नाम वंदना था। पर थी घर में सबसे छोटी । दो साल की ही तो थी सो सब छुटकी छुटकी पुकारते थे। दौड़ते दौड़ते अचानक गिर गयी। घुटना थोड़ी छिल गया। मामूली खून रिसने लगा । छुटकी के चीखने की आवाज़ सुनकर रमन ने आव देखा न ताव दौड़कर उसके पास आया । घाव का मुआयना किया । उसे एंटी सेप्टिक से साफ करके थोड़ी दवा लगा दी । रूचि जब तक घटनास्थल पर पहुंची तब तक इलाज हो चुका था। छुटकी तो चाचा के छूने भर से ठीक हो गयी थी ।


अब अमूमन हर दिन रमन घर में लड़खड़ाते हुए ही घुसता था। मुकेश को चिंता होने लगी थी। रूचि हमेशा की तरह नाक भों चढाती । पर छुटकी को कोई फरक नहीं पड़ता। रमन बारहवीं पास था। मुकेश पोस्ट ग्रेजुएट। मुकेश की अच्छी खासी नौकरी थी । और रमन परचून की दुकान चलाता था। मुकेश घर का कमाऊ बेटा था और रमन नाकारा। माँ बाप काफी पहले चल बसे थे । मुकेश ने ले देकर बारहवीं करवाई। बाद में जब ऑफिस मेट रूचि से शादी हो गयी तो छोटे भाई से ध्यान हट सा गया । सो रमन की पढाई छूट गयी। पर बाद में मुकेश ने ही वो दुकान रमन को किराये पर दिलवाई थी । पर काम चला नहीं। सो किराया ही बड़ी मुश्किल से निकलता था।


मन ही मन रूचि रमन से नफरत सी करती थी। एक तो गरीब अनपढ़ ऊपर से शराब पीने की लत। उसका चेहरा देखते ही छाती पे सांप लौटने लगता। उसका बस चले तो छुटकी पर उसका साया न पड़ने दे। आवारा कहीं का। पर मुकेश की ढिलाई के चलते छुटकी चाचा से मिल ही लेती थी। धीरे धीरे छुटकी बड़ी होने लगी थी। और साथ ही बढ़ने लगी थी रूचि की रमन के लिए नफरत और छुटकी का चाचा से लगाव । छुटकी पहली कक्षा में पड़ने लगी थी। और अब घर आकर स्कूल के सारे वाकये चाचा को ही बताती। तरह तरह की कविताये भी याद हो गयी थी उसे । रमन को अपनी ज़िन्दगी में बस छुटकी के साथ बिताया हुआ वक़्त ही अच्छा लगता था। बाकी कुछ नहीं।


एक दिन जब छुटकी शाम को बाहर खेलने गयी तो काफी देर तक वापस नहीं आयी। रूचि और मुकेश परेशान होकर इधर उधर ढूंढ़ने लगे। तभी छुटकी को रमन की दुकान की ओर से आते हुए देखा। उसके कपडे फटे हुए से थे। बाल बेतरतीब और तीन-चार जगह खरोंच। रूचि पगलाई हुई सी चीखी - " क्या हुआ ?"। " मम्मी! चाचा..." छुटकी इसके आगे बोल न पायी। रूचि की आँखें गुस्से से लाल हो गयी। "कहा था न मैंने" वह मुकेश के ऊपर चीख पड़ी। "देख लिया ? अब खड़े रहो चुपचाप " रूचि ने कहा पर मुकेश कुछ सोच में डूबा सा हुआ था। अचानक मानो होश सा आया तो बेतहाशा रमन की दुकान की ओर दौड़ा। हांफता हांफता पहुंचा तो देखा तो कुछ दूर पर पहले से काफी भीड़ जमा है। " हटो, मुझे जाने दो - मुकेश ने कहा और भीड़ को चीरता हुआ सा बढ़ने लगा।


रमन का निर्जीव शरीर सामने ज़मीन पर पड़ा हुआ था।


"बच्चो की चीख सुनकर हम लोग आये तब तक रमन भैया भिड़ गए थे इससे" - भीड़ में से एक ने दूर पड़े एक भेड़िये के शव की तरफ इशारा करते हुए कहा। " पर खुद भी बच न पाए। जान से भी ज्यादा जो प्यार करते थे छुटकी को ..."

4 Comments


abhi kumar
abhi kumar
Dec 24, 2022

भाई दिल निकाल कर कहानी में रख दिया है ि सन्देश शानदार तरीके से दे रहा है

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Mukul Bharadwaj
Mukul Bharadwaj
Dec 25, 2022
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Thanks for your support.

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vinay sharma
vinay sharma
Dec 24, 2022

Intresting story... sometimes our perception goes wrong.We can't judge a person based on what we have thoughts about him.

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Mukul Bharadwaj
Mukul Bharadwaj
Dec 25, 2022
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Glad to hear. Thanks. We'll try coming up with more content in the times to come.

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